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Monday, 11 June 2012

Mushroom ki kheti

मशरुम की खेती

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अंतर्गत काम करने वाले भारतीय बाग़वानी अनुसंधान संस्थान बंगलुरू ने घरेलू स्तर पर मशरूम उत्पादन को प्रोत्साहित करने का एक कार्यक्रम तैयार किया है, जिसके तहत महिलाओं को घर बैठे उपभोग के लिए मशरूम मिलने के अलावा आय अर्जित करने का भी मौक़ा मिलता है. संस्थान की मशरूम प्रयोगशाला ने घरेलू स्तर पर मशरूम पैदा करने की ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे एक वर्ग फुट क्षेत्र में 5.5 फुट की ऊंचाई तक 1.5 से 2 किलोग्राम तक मशरूम का उत्पादन किया जा सकता है.

    संस्थान ने नारंगी रंग का खूबसूरत मशरूम पैदा करने की तकनीक विकसित की है, जो गमले रखने वालों और पुष्प प्रेमियों के लिए एक आकर्षण है. मशरूम को प्रोत्साहित करने का एक लाभ यह भी है कि पैदावार के बाद इसकी बची-खुची सामग्री जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ाने और जैविक खाद तैयार करने में सहायक सिद्ध होती है.

मशरूम प्रति इकाई क्षेत्र में अधिकतम प्रोटीन देता है. इसे घर के किसी भी नमी वाले कोने में उगाया जा सकता है. महिलाएं इसे किचन गार्डन गतिविधि के रूप में अपना सकती हैं. वैसे भी देश की 50 प्रतिशत महिला आबादी कृषि से जुड़ी गतिविधियों में 90 प्रतिशत का योगदान करती है. घर में ही मशरूम की खेती करना महिलाओं की कार्यशैली और प्रबंध कौशल के सर्वथा अनुकूल है. शाकाहारी परिवारों की प्रोटीन की ज़रूरत को पूरा करने के लिए प्रोटीन से भरपूर मशरूम की खेती घर में बहुत आसानी के साथ की जा सकती है.

घर में मशरूम पैदा करना और परिवार के प्रत्येक सदस्य को 100 ग्राम मशरूम उपलब्ध कराने का मतलब है हृदय रोग के खतरे को कम करना, क्योंकि मशरूम में कोलेस्ट्रोल कम करने की क्षमता है. यह मधुमेह को नियंत्रित करता है और कैंसर रोगियों की कीमोथेरेपी के बाद होने वाले साइड इफेक्ट को भी कम करता है. यही नहीं, यह केलेट्रा लेने वाले एड्‌स रोगियों के लिए भी फायदेमंद है, क्योंकि इससे एंटी हाइपरलिपिडेमिक प्रभाव कम होता है. घरेलू स्तर पर मशरूम की खेती के अलावा संस्थान द्वारा तैयार की गई व्यवसायिक मशरूम उत्पादन तकनीक के ज़रिए ओएस्टर, बटन, मिल्की, पैडी स्ट्रा, शिटेक और रेशी आदि किस्मों के मशरूम का उत्पादन किया जा सकता है. दैनिक उपभोग के लिए पैदा की जाने वाली इन क़िस्मों के अलावा महिलाओं के सामने मशरूम का बीज तैयार करने का वैकल्पिक व्यवसाय भी है, क्योंकि बीज की कमी के कारण मशरूम का उत्पादन नहीं बढ़ पाता है और इसकी क़ीमत भी अधिक रहती है. मशरूम का बीज तैयार करने की तकनीक आसान है. महिलाओं को इसके लिए बहुत अधिक निवेश भी करने की जरूरत नहीं होती. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार पैदा करने के अच्छे अवसर हैं, क्योंकि वहां मशरूम के बीजों की कमी रहती है.

भारतीय बाग़वानी अनुसंधान संस्थान बंगलुरु उत्पादकों के लिए नियमित रूप से मशरूम की खेती और इसके बीज तैयार करने के प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित करता है. मशरूम से बनने वाले नाना प्रकार के व्यंजन तैयार करना भी महिलाओं के लिए एक अनुकूल व्यवसाय है. आज के समय में जबकि कामकाजी महिलाओं के लिए घर में तरह-तरह के व्यंजन तैयार करना संभव नहीं है, पोषक तत्वों से भरपूर मशरूम के व्यंजन बनाकर उनकी आपूर्ति करना एक अच्छा व्यवसाय हो सकता है. मशरूम पाउडर, मशरूम पापड़ और मशरूम का अचार तैयार करने का काम कुटीर उद्योग स्तर पर किया जा सकता है. मशरूम सैंडविच, मशरूम चावल, मशरूम सूप और मशरूम करी आदि व्यंजन पहले से ही का़फी लोकप्रिय हैं. संस्थान ने नारंगी रंग का खूबसूरत मशरूम पैदा करने की तकनीक विकसित की है, जो गमले रखने वालों और पुष्प प्रेमियों के लिए एक आकर्षण है. मशरूम को प्रोत्साहित करने का एक लाभ यह भी है कि पैदावार के बाद इसकी बची-खुची सामग्री जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ाने और जैविक खाद तैयार करने में सहायक सिद्ध होती है.

Labhkari hai Mushroom ki kheti


लाभकारी है मशरूम की खेती

मशरूम का उत्पादन कर लघु व सीमांत किसान भी कम लागत और अल्प अवधि में ज्यादा लाभान्वित हो सकते हैं. जिले में एक दशक पूर्व मशरूम की अच्छी उपज होती थी, जो विगत वषरें में नहीं हो रहा था. परंतु महंगी खेती से हलकान किसानों ने फिर उद्यमिता पर ध्यान देना शुरू कर दिया है.

जिले के कई किसान आज मशरूम उत्पादन की ओर रूख कर चुके हैं और उन्होंने वैज्ञानिकों की सहायता लेकर नयी तकनीक से उत्पादन में जुड़ गये हैं. नयी-नयी फसलों की खेती कर जिले के किसान मॉडल बने तुरकौलिया पश्चिमी पंचायत के नया टोला निवासी सेवानिवृत्त प्रखंड कृषि पदाधिकारी कन्हैया सिंह मशरूम उत्पादन में जुड़े जिले के लघु व सीमांत किसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत बने हैं.

श्री सिंह बताते हैं कि मशरूम के लिए खेती करने की सलाह उन्हें डीडीसी से मिली. जिस पर उन्होंने तकनीक की जानकारी प्राप्त कर मशरूम का प्रत्यक्षण के लिए छोटे से कमरे से उत्पादन करने की शुरुआत की. उन्होंने बताया कि प्रत्यक्षण के रूप में 100 वर्ग फुट की जगह में किया गया उत्पादन सफल रहा.

उत्पादन की विधि
इस संदर्भ में श्री सिंह बताते हैं कि मशरूम उत्पादन के लिए सितंबर से मार्च तक का माह उपयुक्त होता है, क्योंकि इसके उत्पादन के लिए ठंड का मौसम अनुकूल होता है. उत्पादन के लिए धान के पुआल, कुट्टी या गेहूं के भूसे को 24 घंटे गर्म पानी में डूबा कर उपचारित करने के बाद उसे हल्का सूखा दिया जाता है.

फिर 18 गुणा 24 इंच के पॉलीथिन बैग में भूसे को एक इंच बिछा कर प्रत्येक पॉलीथिन में 100 ग्राम मशरूम बीज बिछा दें. इसके बाद एक इंच मोटा भूसा बिछा कर बीज को ढंक दें और पॉलीथिन का मुंह बंद करते वक्त उसमें 15 से 20 कांटेदार औजार से पॉलीथिन में छिद्र कर दें और उसे कमरे में शेड से लटका दें.

इस विधि को 25-30 दिनों में मशरूम तैयार हो जायेगा. इस विधि में प्रति बैग में रखे 100 ग्राम का बीज से डेढ़ से दो किलो कच्चा मशरूम का उत्पादन हुआ है. वे बताते हैं कि सावधानी से तैयार मशरूम को निकाल, फिर उसे शेड से लटका दें.

इस तरह प्रत्येक 25 दिनों के अंतराल पर तीन बार उत्पादन होगा. उन्होंने बताया कि 100 वर्ग फुट में मशरूम उत्पादन पर करीब पांच हजार की लागत आती है, जबकि तीन बार में प्राप्त उत्पादन से किसान को बाजार मूल्य से 12 हजार रुपये की राशि प्राप्त होती है.

क्या है उपयोग
गौरतलब हो कि मशरूम का उपयोग सब्जी, पकौड़ा, अचार, सूप व मशरूम मिट के रूप में खाने के उपयोग में आता है. साथ ही, मशरूम से मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, गठिया, कैंसर आदि की दवा बनाने में भी इसका प्रयोग होता है. मशरूम का प्रयोग खाद्य पदार्थ व दवाओं में प्रयोग होने से बाजार में इसकी अधिक मांग है.

यहां बता दें कि मशरूम का जिक्र पुराने ग्रंथों में भी अच्छे हर्ब के रूप में वर्णन की गयी है. वहीं, सनातन धर्म में ग्रंथ भृगु सहित इसे रोजाना सेवन करने की सलाह दी गयी है. वहीं, हजारों वर्ष पुराने चीन के मेडिसिन डायरेक्टरी में साल में 355 दिन सेवन करने की सलाह देते हुए वेदों में शक्तिशाली औषधि में से मशरूम को ए-वन से श्रेष्ठतम बताया है.

कम लागत लगाएं, अच्छा मुनाफा पाएं

बेवर: अधिकांश आबादी शाकाहारी है जिसमें कुपोषण एक मुख्य समस्या है। कुपोषण से बचने के लिए मशरूम से बेहतर और सस्ता कुछ भी नहीं हो सकता, शायद यही कारण है कि दिनों दिन मशरूम की मांग बढ़ रही है। मौजूदा समय मशरूम पैदा करने के लिए सर्वोत्तम समय है। किसान मशरूम उत्पादन कर कम लागत में भारी मुनाफा कमा सकते हैं। मशरूम की मांग शाकाहारी व मांसाहारी दोनों ही वर्गो में बढ़ती जा रही है। सब्जी की दुकान से लेकर पंच सितारा होटलों तक में इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है।

खंड विकास अधिकारी रामसागर यादव बताते हैं कि यहां का किसान आलू के पीछे पड़ा है, जबकि आलू में प्रति वर्ष बढ़ती लागत और बम्पर पैदावार के चलते खपत का न हो पाना एक मुख्य समस्या है,यही कारण है कि किसान लगातार घाटे में जा रहा है। श्री यादव का कहना है कि मौजूदा समय मशरूम उत्पादन के लिए श्रेष्ठ समय है और इसे हर जगह बड़े आराम से उगाया जा सकता है। शुरूआती समय में इसके लिए 22से 26 डिग्री सेन्टीग्रेड की और बाद में 14 से 18 डिग्री सेन्टीग्रेड की आवश्यकता होती है। इसे उगाने का तरीका भी बहुत ही आसान है। इसके लिए पुआल तथा स्थानीय अपशिष्टों की कम्पोस्ट बना कर यदि थैलियों में उगाना है तो प्लास्टिक की थैलियों में भर कर 2 मिमी. व्यास के छोटे छोटे छेद कर देते है विशेष प्रकार के मशरूम बीज को विश्वसनीय दुकान से खरीदकर बिजाई कर देनी चाहिए। इन थैलियों को एक कक्ष में रखकर उस पर पुराने अखबार से ढक देना चाहिए। नमी बनाए रखने के लिए पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए। दो महीने में मशरूम तैयार हो जायेगी। समान्यत: 8 से 9 किलो मशरूम प्रति वर्ग मीटर में पैदा होती है। मशरूम में बटन प्रजाति सरल ढंग से पैदा की जा सकती है। मौजूदा समय में मशरूम 110 से लेकर 150 रूपया प्रति किलो तक बिक रही है। इसके व्यंजन शादी समारोह में भी शान बढ़ा रहे हैं, जो किसान के लिए काफी लाभदायक हो सकता है।

Friday, 18 May 2012

प्रशिक्षण में मशरूम उत्पादकों को नई तकनीक के टिप्स - Mushroom cultivation training in india

मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र बघरा में आयोजित एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में वैज्ञानिकों ने 25 मशरूम उत्पादकों को उत्पादन की नवीनतम तकनीक के टिप्स दिए।
मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिए बुधवार को सरदार बल्लभ भाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय मेरठ के वैज्ञानिकों डा. रामजीत सिंह व डा. प्रशांत मिश्रा ने 25 उत्पादकों को मशरूम उत्पादन तकनीक में आ रही समस्याओं का समाधान किया। तथा विपणन तकनीक की जानकारी दी। वैज्ञानिकों का कहना था कि मशरूम में पौष्टिकता व औषधीय गुण होने के कारण भविष्य में इसकी खेती की अपार संभावनाएं हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन होगा और आय के साधन सुलभ होंगे। उन्होंने इसे उद्यम के रूप में अपनाने पर बल दिया। प्रशिक्षण में मशरूम की पूरे वर्ष उत्पादित होने वाली प्रजातियों की जानकारी दी तथा बीज को विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से प्राप्त करने को कहा।
प्रशिक्षण में केन्द्र के सह निदेशक प्रसार डा. सत्यप्रकाश ने कहा कि मशरूम में वसा की मात्रा बहुत कम होती है। प्रॉटीन व रेशे की मात्रा अधिक होने के कारण हृदय रोगियों के लिए यह रामबाण है। अतिरिक्त विटामिंस व मिनरल्स पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे कृषक जिनके पास भूमि नहीं है वे कम पूंजी लगाकर इसे रोजगार के रूप में अपनाकर आय अर्जित कर सकते हैं। आरके मोघा ने कहा कि प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले युवकों को रोजगार सृजन हेतु प्राथमिकता दी जाएगी। प्रशिक्षण में डा. श्रीपाल राणा, सविता आर्या, डा. प्रदीप कुमार का सहयोग रहा।

Thursday, 10 May 2012

मशरूम की खेती - Mushroom Ki Kheti {How to do Mushroom Cultivation in India}

वर्तमान समय में बढती  हुई जनसंख्या के कारण लगातार कृषि जोत भूमि घटती जा रही है जिसके कारण पौष्टिक खाद्य पदार्थ का उत्तपादन कर पाना एक समस्या बनता जा रहा है | इस  परिस्थिति में मशरूम की खेती करना आवश्यक समझा जाने लगा है | क्योकि मशरूम में प्रोटीन , विटामिन एवं खनिज लवण पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है तथा इसकी खेती के लिए खेत की जरूरत भी नहीं पड़ती है, बस एक छायादार कमरे के अन्दर चाहे वो घास का हो या कच्चे या पक्के मकान का एक कमरा हो, बस हवा का आवागमन एवं पानी की सुविधा हो बस हम सुगमता पूर्वक मशरूम की खेती  कर सकते है | इसकी खेती की एक और विशेषता होती है की यह अन्य सब्ब्जी या अनाज की भाति अधिक समय नहीं लेती है |  यदि बिज उपलब्ध हो तो ३० दिन के अन्दर इसकी फसल तैयार हो जाती है |  और अगर हम इसका तापमान नियंत्रित कर सके तो हम इसकी खेती सालभर कर सकते है |
और इसकी खेती करना भी बहुत आसन है बस हमें गेहू का भूसा, धान की पुआल, ज्वार या फिर बाजरे का डंठल चाहिए | हमें  भूसे को साफ पानी से भिगान है और उस भीगे हुए भूसे को एक पालीथीन में भरना है और भूसा भरते समय ही एक लेयर भूसे का एवं उसके ऊपर कुछ बिज मशरूम के फिर एक लेयर भूसे का  और एक लेयर मशरूम के बिज का इसी तरह कर के  रख देना है ताकि भूसा चारो तरफ फ़ैल ना सके और उस पालीथीन में कुछ सुराख़ भी कर देना चाहिए जिससे की हवा आ, जा सके और प्रतिदिन भूसे पर साफ पानी का छिडकाव करना चाहिए | बस ३० दिनों के अन्दर मशरूम तैयार हो जायेगा |
हमारे देश में बहुत से किसान इन फसल अवशेष को जला देते है जिससे की वायु में प्रदुषण बढ़ जाता है और पर्यावरण असंतुलित हो जाता है जिसका प्रभाव प्रकृति में रहने वाले अन्य जीवो पर पड़ता है | अतः मशरूम की खेती  करने से पर्यावरण को सुरछित रखा जा सकता है | मशरूम उत्तपादन के पश्चात् जो भी फसल का अवशेष बचाता है उसका उपयोग हम जैविक खाद बनाने में ला सकते है एवं अपने खेतो में डाल सकते है | जिससे की खेत की उरवरा शक्ति में में ब्रिधि होगी, तथा खेत में जीवाष्म की मात्रा बढ़ेगी| इस तरह करने पर हमारे खेत की भौतिक एवं रासायनिक संरचना में सुधार होता है |

लागत कम, मुनाफा अधिक देता है मशरूम- मशरूम की खेती - Do mushroom farming yields high profitability in India

मशरूम की खेती से कम लागत में अधिक मुनाफा मिल सकता है। यह कई मर्ज की दवा भी है। इस कारण जिले में मशरूम की खेती का प्रयास प्रारंभ किया गया है। इसके लिए महिलाओं को जागरूक करने के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केंद्र में मशरूम प्रशिक्षण देने सहित अनेक कार्य चलाए जा रहे हैं। जिले की करीब पचास महिलाएं मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण भी ले चुकी हैं।
मशरूम की खेती काफी कम खर्च में अधिक मुनाफा देने वाला होता है। इसके लिए काफी अधिक जगह की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। मशरूम की खेती के लिए घर के किसी भी कमरे का उपयोग किया जा सकता है। इसमें पुआल की कुट्टी का डेढ़ इंच का स्तर बनाकर उसमें मशरूम के बीज डाले जाते है। इससे पहले इसमें कुछ रसायन का प्रयोग करते है। 20 दिन के बाद कुट्टी पर सफेद रंग के जाल दिखने लगते है, जो 30 दिनों के बाद तैयार होने लगता है। लोग मशरूम की खेती घर का सारा काम करने के बाद बचे समय में कर सकते है। इसके लिए अलग से समय देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है और महिलाओं के लिए अर्थोपार्जन का एक अच्छा जरिया बन सकता है। देहातों में न केवल लोग इसकी सब्जी बनाकर खाते हैं बल्कि बाजारों में बेचकर आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकते हैं।
मशरूम से होने वाले फायदे
मशरूम न केवल एड्स जैसे रोग से बचाने की क्षमता रखता है वरन उच्च रक्त चाप, मधुमेह, हृदय रोग, मोटापा, गठिया, एलर्जी एवं कैंसर से बचाने में भी लाभदायक है। यह कई विटामिनों से लवरेज है। मशरूम में काफी मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। जो छोटे बच्चे और बूढ़ों के लिए काफी फायदेमंद होता है। मशरूम में उतना ही प्रोटीन होता है, जितना किसी भी प्रकार के मांस में। इसलिए वैसे लोग जो शाकाहारी होते है, प्रोटीन के लिए इसका प्रयोग कर सकते है।
क्या कहते हैं कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वयक
साहिबगंज कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वयक अमृत कुमार झा ने बताया कि मशरूम की खेती के लिए किसानों को अभी रांची से स्पोन यानी बीज मंगाकर दिया जा रहा है और अभी कृषि विज्ञान केंद्र में इसकी प्रदर्शनी लगाई गई है। इसकी खेती भी जिले के किसान कर रहे हैं। आने वाले वक्त में ज्यादा से ज्यादा लोग इसकी खेती कर सकें, यह कृषि विज्ञान केंद्र का प्रयास है।