सीतामढ़ी। कहते है कि मेहनत का फल मीठा होता है। कुछ ऐसे ही मजबूत इरादों से किए गए मेहनत का फल शहर के राम नारायण को मिला है। 37 वर्षीय राम नारायण मशरूम की खेती के जरिए आर्थिक आजादी की इबादत लिख डाली है। कम लागत, कम समय व हल्की देख भाल के बाद राम नारायण ने अपने कमरे में मशरूम उगाया है, जो उनके लिए सोना साबित हो रही है। कम समय में ही मशरूम ने उनकी जिंदगी बदल दी है। मूल रूप से परिहार प्रखंड के मुसहरनिया गांव निवासी राम नारायण वैसे तो परंपरागत खेती भी करते रहे है, लेकिन अब वह केवल मशरूम की खेती करना चाहते है। वजह इसमें कमाई ज्यादा है। पूसा कृषि विवि से मशरूम की खेती का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने इसका उत्पादन शुरू किया। बताते है कि दो हजार की लागत से इसकी खेती की जाती है और 22 दिन बाद फसल तैयार हो जाता है। जिसका बाजार मूल्य न्यूनतम 5 हजार 5 सौ मिल जाता है। मशरूम की खेती बारहों मास की जा सकती है। बताते है कि मशरूम की खेती बेरोजगारी भगाने का अचूक हथियार साबित हो सकती है। बशर्ते की इसकी खेती पूरे मन से की जाए। राम नारायण कहते है ऐसा कौन सा धंधा है जिसमें बीस बाइस दिन में लागत का दो गुणा कमाई होता हो। मशरूम की खेती गांव व शहर में कही भी कमरे में की जा सकती है। बस कमरों में अंधेरा के साथ तापमान नम होना चाहिए। बताते है कि वे दो कमरों में मशरूम उपजा रहे है। शुरू में एक ही कमरे के छोटे से भाग में इसकी खेती की। मांग बढ़ती गई तो कमाई बढ़ी। कमाई बढ़ी तो खेती का दायरा भी बढ़ता गया। राम नारायण ने इस साल 60 हजार किलो मशरूम के उत्पादन का लक्ष्य रखा है। बताते है कि मशरूम पोष्टिक तत्वों से भरपुर एक प्रकार की सब्जी है। इसमें प्रोटीन, थायमीन, राइजोलेवन, विटामीन सी, नाइसिल, आयरन, कैल्सियम, मैगनीशीयम, फासफोरस, पोटाश व जिंक प्रचुर मात्रा में पाए जाते है। यह सुपाच्य व सेहत के लिए लाभकारी होता है। यही वजह है कि चिकित्सक भी इसका प्रयोग करने की बात कहते है। पूरे विश्व में मशरूम लोगों की बड़ी मांग बन गया है। अब जिले में भी इसकी मांग बढ़ रहा है। वर्तमान में एक किलो मशरूम की कीमत सौ रुपये मिल रही है। अब तक इसे स्थानीय बाजारों में बेचते थे, अब बाहर से भी इसकी मांग होने लगी है। राम नारायण स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त कर चूके है। उनके खेती की तकनीक अब उनके परिवार के सदस्य तो अपना ही रहे है, आस पास के किसान भी उनसे इस खेती की तकनीक जानने पहुंच रहे है।
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Saturday, 12 May 2012
लागत कम, मुनाफा अधिक देता है मशरूम- Mushroom Cultivation
साहिबगंज, जासं. : मशरूम की खेती से कम लागत में अधिक मुनाफा मिल सकता है। यह कई मर्ज की दवा भी है। इस कारण जिले में मशरूम की खेती का प्रयास प्रारंभ किया गया है। इसके लिए महिलाओं को जागरूक करने के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केंद्र में मशरूम प्रशिक्षण देने सहित अनेक कार्य चलाए जा रहे हैं। जिले की करीब पचास महिलाएं मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण भी ले चुकी हैं।
मशरूम की खेती काफी कम खर्च में अधिक मुनाफा देने वाला होता है। इसके लिए काफी अधिक जगह की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। मशरूम की खेती के लिए घर के किसी भी कमरे का उपयोग किया जा सकता है। इसमें पुआल की कुट्टी का डेढ़ इंच का स्तर बनाकर उसमें मशरूम के बीज डाले जाते है। इससे पहले इसमें कुछ रसायन का प्रयोग करते है। 20 दिन के बाद कुट्टी पर सफेद रंग के जाल दिखने लगते है, जो 30 दिनों के बाद तैयार होने लगता है। लोग मशरूम की खेती घर का सारा काम करने के बाद बचे समय में कर सकते है। इसके लिए अलग से समय देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है और महिलाओं के लिए अर्थोपार्जन का एक अच्छा जरिया बन सकता है। देहातों में न केवल लोग इसकी सब्जी बनाकर खाते हैं बल्कि बाजारों में बेचकर आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकते हैं।
मशरूम से होने वाले फायदे
मशरूम न केवल एड्स जैसे रोग से बचाने की क्षमता रखता है वरन उच्च रक्त चाप, मधुमेह, हृदय रोग, मोटापा, गठिया, एलर्जी एवं कैंसर से बचाने में भी लाभदायक है। यह कई विटामिनों से लवरेज है। मशरूम में काफी मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। जो छोटे बच्चे और बूढ़ों के लिए काफी फायदेमंद होता है। मशरूम में उतना ही प्रोटीन होता है, जितना किसी भी प्रकार के मांस में। इसलिए वैसे लोग जो शाकाहारी होते है, प्रोटीन के लिए इसका प्रयोग कर सकते है।
क्या कहते हैं कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वयक
साहिबगंज कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वयक अमृत कुमार झा ने बताया कि मशरूम की खेती के लिए किसानों को अभी रांची से स्पोन यानी बीज मंगाकर दिया जा रहा है और अभी कृषि विज्ञान केंद्र में इसकी प्रदर्शनी लगाई गई है। इसकी खेती भी जिले के किसान कर रहे हैं। आने वाले वक्त में ज्यादा से ज्यादा लोग इसकी खेती कर सकें, यह कृषि विज्ञान केंद्र का प्रयास है।
मशरूम की खेती काफी कम खर्च में अधिक मुनाफा देने वाला होता है। इसके लिए काफी अधिक जगह की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। मशरूम की खेती के लिए घर के किसी भी कमरे का उपयोग किया जा सकता है। इसमें पुआल की कुट्टी का डेढ़ इंच का स्तर बनाकर उसमें मशरूम के बीज डाले जाते है। इससे पहले इसमें कुछ रसायन का प्रयोग करते है। 20 दिन के बाद कुट्टी पर सफेद रंग के जाल दिखने लगते है, जो 30 दिनों के बाद तैयार होने लगता है। लोग मशरूम की खेती घर का सारा काम करने के बाद बचे समय में कर सकते है। इसके लिए अलग से समय देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है और महिलाओं के लिए अर्थोपार्जन का एक अच्छा जरिया बन सकता है। देहातों में न केवल लोग इसकी सब्जी बनाकर खाते हैं बल्कि बाजारों में बेचकर आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकते हैं।
मशरूम से होने वाले फायदे
मशरूम न केवल एड्स जैसे रोग से बचाने की क्षमता रखता है वरन उच्च रक्त चाप, मधुमेह, हृदय रोग, मोटापा, गठिया, एलर्जी एवं कैंसर से बचाने में भी लाभदायक है। यह कई विटामिनों से लवरेज है। मशरूम में काफी मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। जो छोटे बच्चे और बूढ़ों के लिए काफी फायदेमंद होता है। मशरूम में उतना ही प्रोटीन होता है, जितना किसी भी प्रकार के मांस में। इसलिए वैसे लोग जो शाकाहारी होते है, प्रोटीन के लिए इसका प्रयोग कर सकते है।
क्या कहते हैं कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वयक
साहिबगंज कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वयक अमृत कुमार झा ने बताया कि मशरूम की खेती के लिए किसानों को अभी रांची से स्पोन यानी बीज मंगाकर दिया जा रहा है और अभी कृषि विज्ञान केंद्र में इसकी प्रदर्शनी लगाई गई है। इसकी खेती भी जिले के किसान कर रहे हैं। आने वाले वक्त में ज्यादा से ज्यादा लोग इसकी खेती कर सकें, यह कृषि विज्ञान केंद्र का प्रयास है।
मशरूम की खेती से अच्छी आमदनी संभव- Mushroom Cultivation
जाड़े के मौसम में किसान मशरूम की खेती कर अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। इस मौसम में खंभी एवं बटन नामक मशरूम की खेती की जाती है। किसान मशरूम की खेती कर अच्छी कमाई कर सकते है।
कृषि वैज्ञानिक के.के.सिंह ने बताया कि खंभी मशरूम की खेती के लिये पुआल को छोटे-छोटे टुकड़ो में काटकर 12 घंटे तक वेवस्टीन के घोल में उपचारित किया जाना चाहिए। इसके पश्चात पानी से छान कर सूखे हुये पुआल में डेढ़ सौ से 180 ग्राम मशरूम का बीज प्रति किग्रा की दर से मिलाकर पॉलीथीन में भर दिया जाता है। और उसे अंधेरे कमरे में आठ से दस दिनों तक के लिए छोड़ दिया जाता है। उन्होंने बताया कि इस दौरान पुआल के चारो ओर मशरूम कवक का जाल तैयार हो जाता है। कवक जाल तैयार होने के पश्चात पुआल से पालीथीन को हटा कर रोशनदार कमरे में रखना चाहिए। साथ ही नमी बनाये रखने के लिये समय-समय पर पानी का छिड़काव करने रहना चाहिए ताकि 80 से 90 प्रतिशत नमी बनी रहे। यह प्रक्रिया एक सप्ताह तक जारी रखनी चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे मशरूम का फलन होना प्रारंभ हो जाता है। उन्होंने बताया कि 15-20 रुपये प्रति बैग की लागत पर 70 से 80 रुपये का मुनाफा अर्जित किया जा सकता है। इधर प्रवीण कुमार पंडित, सुबोध कुमार चौधरी, सुभाष झा आदि ने अनुभव बांटते हुए बताया कि गत वर्ष मशरूम से उन्हें अच्छी आमदनी प्राप्त हुई।
कृषि वैज्ञानिक के.के.सिंह ने बताया कि खंभी मशरूम की खेती के लिये पुआल को छोटे-छोटे टुकड़ो में काटकर 12 घंटे तक वेवस्टीन के घोल में उपचारित किया जाना चाहिए। इसके पश्चात पानी से छान कर सूखे हुये पुआल में डेढ़ सौ से 180 ग्राम मशरूम का बीज प्रति किग्रा की दर से मिलाकर पॉलीथीन में भर दिया जाता है। और उसे अंधेरे कमरे में आठ से दस दिनों तक के लिए छोड़ दिया जाता है। उन्होंने बताया कि इस दौरान पुआल के चारो ओर मशरूम कवक का जाल तैयार हो जाता है। कवक जाल तैयार होने के पश्चात पुआल से पालीथीन को हटा कर रोशनदार कमरे में रखना चाहिए। साथ ही नमी बनाये रखने के लिये समय-समय पर पानी का छिड़काव करने रहना चाहिए ताकि 80 से 90 प्रतिशत नमी बनी रहे। यह प्रक्रिया एक सप्ताह तक जारी रखनी चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे मशरूम का फलन होना प्रारंभ हो जाता है। उन्होंने बताया कि 15-20 रुपये प्रति बैग की लागत पर 70 से 80 रुपये का मुनाफा अर्जित किया जा सकता है। इधर प्रवीण कुमार पंडित, सुबोध कुमार चौधरी, सुभाष झा आदि ने अनुभव बांटते हुए बताया कि गत वर्ष मशरूम से उन्हें अच्छी आमदनी प्राप्त हुई।
मशरूम की खेती जाड़े में लाभप्रद- Mushroom Cultivation in india
स्थानीय कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रशासनिक भवन में पिछले छह दिनों से जारी किसानों का प्रशिक्षण सोमवार को संपन्न हो गया। समापन के अवसर पर किसानों को पिछले छह दिनों में दी गयी जानकारी की समीक्षा की गयी। साथ ही मशरूम उत्पादन की वैज्ञानिक जानकारी दी गयी। प्रतिभागी किसानों को बताया गया कि मशरूम की खेती जाड़े के मौसम में लाभप्रद है। इस मौसम में खंभी एवं बटन नामक मशरूम की खेती की जाती है। किसान मशरूम की खेती कर अच्छी कमाई कर सकते है। कृषि वैज्ञानिक के.के.सिंह ने बताया कि खंभी मशरूम की खेती के लिये पुआल को छोटे-छोटे टुकड़ो में काटकर 12 घंटे तक वेवस्टीन के घोल में उपचारित किया जाना चाहिए। इसके पश्चात पानी से छान कर सूखे हुये पुआल में डेढ़ सौ से 180 ग्राम मशरूम का बीज प्रति किग्रा की दर से मिलाकर पालीथीन में भर दिया जाता है। और उसे अंधेरे कमरे में आठ से दस दिनों तक के लिए छोड़ दिया जाता है। उन्होंने बताया कि इस दौरान पुआल के चारो ओर मशरूम कवक का जाल तैयार हो जाता है। कवक जाल तैयार होने के पश्चात पुआल से पालीथीन को हटा कर रोशनदार कमरे में रखना चाहिए। साथ ही नमी बनाये रखने के लिये समय-समय पर पानी का छिड़काव करने रहना चाहिए ताकि 80 से 90 प्रतिशत नमी बनी रहे। यह प्रक्रिया एक सप्ताह तक जारी रखनी चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे मशरूम का फलन होना प्रारंभ हो जाता है। उन्होंने बताया कि 15-20 रूपये प्रति बैग की लागत पर 70 से 80 रूपये का मुनाफा अर्जित किया जा सकता है। प्रशिक्षण में प्रवीण कुमार पंडित, सुबोध कुमार चौधरी, सुभाष झा, मंजु झा, शोभा सहित 15 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
सेहत के लिए रामबाण है ‘मशरूम’ - Mushroom for Better Health
जबलपुर। मशरूम विशेषज्ञ डॉ जया सिंह ने कहा कि देश के महानगरों में अब मशरूम का सेवन बड़े चाव से किया जाने लगा है, लेकिन उचित जानकारी के अभाव में अभी इसका महत्व सोच से दूर है।
डॉ.सिंह ने यहां एक शासकीय कॉलेज में आयोजित कार्यशाला में कहा कि मशरूम का सेवन मानव सेहत के लिए रामवाण है। इसके सेवन से जहां उच्चरक्तचाप नियंत्रित होता है तो वही मोटापा को कम करता है। उन्होंने कहा कि मानव शरीर के लिए मशरूम के महत्व का लोहा वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है।
कुकुरमुत्ते को लगे गर्मी, तो बनी रहे हरियाली
उन्होंने बताया कि मशरूम रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने के साथ ही यह पैरालाइसिस के रोगियों के लिए लाभदायक साबित हुआ है।
साथ ही इसके सेवन से पाचनशक्ति को सुचारू किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में मध्यप्रदेश को मशरूम वर्लड घोषित किया गया है, लेकिन उचित जानकारी के अभाव में लोगों द्वारा इसका कम उपयोग किया जा रहा है।
छोटे मशरूम में है बड़ा करियर
इस अवसर पर मशरूम से निर्मित विभिन्न उत्पादों का प्रदर्शन किया गया तथा साथ ही छात्रों को इसके उत्पादन की विधि से लेकर इसे रोजगार मूलक बनाने में विस्तार से प्रकाश डाला गया।
डॉ.सिंह ने यहां एक शासकीय कॉलेज में आयोजित कार्यशाला में कहा कि मशरूम का सेवन मानव सेहत के लिए रामवाण है। इसके सेवन से जहां उच्चरक्तचाप नियंत्रित होता है तो वही मोटापा को कम करता है। उन्होंने कहा कि मानव शरीर के लिए मशरूम के महत्व का लोहा वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है।
कुकुरमुत्ते को लगे गर्मी, तो बनी रहे हरियाली
उन्होंने बताया कि मशरूम रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने के साथ ही यह पैरालाइसिस के रोगियों के लिए लाभदायक साबित हुआ है।
साथ ही इसके सेवन से पाचनशक्ति को सुचारू किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में मध्यप्रदेश को मशरूम वर्लड घोषित किया गया है, लेकिन उचित जानकारी के अभाव में लोगों द्वारा इसका कम उपयोग किया जा रहा है।
छोटे मशरूम में है बड़ा करियर
इस अवसर पर मशरूम से निर्मित विभिन्न उत्पादों का प्रदर्शन किया गया तथा साथ ही छात्रों को इसके उत्पादन की विधि से लेकर इसे रोजगार मूलक बनाने में विस्तार से प्रकाश डाला गया।
मशरुम उत्पादन- Mushroom cultivation in india
सामान्य रुप से छत्तेदार खाद्य फफूँदी (कवक) को मशरुम या खुँभी कहते हैं।
झारखंड़ में इसे लोग प्रायः खुखड़ी के नाम से जानते हैं। प्रायः मशरुम में ताजे वजन के आधार पर 89-91 % पानी , 0.99-1.26 % राख, 2.78- 3.94% प्रोटीन, 0.25-0.65% वसा,0.07-1.67 % रेशा, 1.30-6.28% कार्बोहाइड्रेट और 24.4-34.4 किलो केलोरी ऊर्जामान होता है। यह विटामिनों जैसे –बी 1, बी 2, सी और डी. एवं खनिज लवणों से भरपूर होता है। यह कई बीमारियों जैसे-बहुमूत्र, खून की कमी, बेरी-बेरी, कैंसर, खाँसी, मिर्गी, दिल की बीमारी, में लाभदायक होता है। इसकी खेती
कृषि, वानिकी एवं पशु व्यवसाय सम्बन्धी अवशेषों पर की जाती है, तथा उत्पादन के पश्चात् बचे अवशेषों को खाद के रुप में उपयोग कर लिया जाता है। उत्पादन हेतु बेकार एवं बंजर भूमि का समुचित उपयोग मशरुम गृहों का निर्माण करके किया जा सकता है। इस प्रकार यह किसानों एवं बेरोजगार नवयुवकों के लिए एक सार्थक आय का माध्यम हो सकता है।
खेती का स्थान
साधारण हवादार कमरा, ग्रीन हाउस, गैरेज, बन्द बरामदा, पालीथिन के घर या छप्परों वाले कच्चे घरों में इसकी खेती की जाती है।
बीज (स्पॉन) अनाज के दानों पर बने उच्चगुणों वाले प्रमाणित बीज (स्पॉन) का ही व्यवहार करें । इसे बिरसा कृषि वि.वि. से प्राप्त कर सकते हैं।
प्रजातियाँ
अगेरिकस या बटन मशरुम – इसे कम्पोस्ट पर 18-250 से. तापक्रम पर जाड़े में उगाया जा सकता है।
वायस्टर या ढिगरी प्लूरोटस मशरुम – इसे 20-280 सें. तापक्रम पर सभीमोसम में उगाया जा सकता है।
वॉलवेरिया या धान के पुआल वाला मशरुम - 30-400 सें. तापक्रम पर गर्मी में उगाया जाता है।
कृत्रिम मशरुम घर में होने पर किसी भी मशरुम की खेती किसी भी समय हो सकती है। झारखण्ड के किसानों या उत्पादकों के लिए सामान्य कमरे के तापक्रम पर ढिगरी (प्लूरोटस) की खेती वर्ष के अधिकांश (9-10 माह) समय में हो सकती है।
ढिगरी (प्लूरोटस) की खेती की विधि
धान या गुंदली के पुआल के कुट्टी (1-1.5’’) या गेहूँ का भूसा 12 घण्टे तक पानी में भिगो लें या ½ घंटे तक उबाल लें। भिंगोने वाले पानी में ½ मिलीलीटर रोगर या नुवान या इंडोसल्फान और 1 ग्राम इंडोफिल या बैविस्टीन 75 मिली ग्राम प्रति लीटर की दर से डालें।
पानी निथार कर कुट्टी/ भूसे को छाये में सूखायें (50-60% नमी रहें)
पालीथिन के थैलियों में (45x60 सेंमी.) 5-6 छिद्र करें । आवश्यक मात्रा का बीज इस कुट्टी में मिला लें या तीन-चार तह लगाकर बिजाई करें । 30-50 ग्राम स्पॉन 1 किलो भीगे पुआल की कुट्टी के लिए पर्याप्त है।
थैलों के खुले मुख को रबर बैण्ड या धागें से बन्द कर लें । 10-15 दिनों के लिए इसे मशरुम उत्पादन घर में रखें।
कुट्टी सफेद हो जाने पर पालीथिन शीट को काटकर हटा लें तथा दिन में 1-2 बार पानी का छिड़काव करें।
2-3 दिनों में मशरुम के छत्ते निकल पड़ेंगे इसकी तुड़ाई पुआल से सटाकर हल्का सा घुमाव देकर करें । 3-4 फसल ली जा सकती है।
उपज
प्रति किलों ग्राम सूखे पुआल / भूसे से लगभग 0.8-1 किलोग्राम ताजा मशरुम का उत्पादन होगा। बटन मशरुम तथा धान पुआल की खेती की विधि के लिये बिरसा कृषि वि.वि के पौधा रोग विभाग से संपर्क करें।
झारखंड़ में इसे लोग प्रायः खुखड़ी के नाम से जानते हैं। प्रायः मशरुम में ताजे वजन के आधार पर 89-91 % पानी , 0.99-1.26 % राख, 2.78- 3.94% प्रोटीन, 0.25-0.65% वसा,0.07-1.67 % रेशा, 1.30-6.28% कार्बोहाइड्रेट और 24.4-34.4 किलो केलोरी ऊर्जामान होता है। यह विटामिनों जैसे –बी 1, बी 2, सी और डी. एवं खनिज लवणों से भरपूर होता है। यह कई बीमारियों जैसे-बहुमूत्र, खून की कमी, बेरी-बेरी, कैंसर, खाँसी, मिर्गी, दिल की बीमारी, में लाभदायक होता है। इसकी खेती
कृषि, वानिकी एवं पशु व्यवसाय सम्बन्धी अवशेषों पर की जाती है, तथा उत्पादन के पश्चात् बचे अवशेषों को खाद के रुप में उपयोग कर लिया जाता है। उत्पादन हेतु बेकार एवं बंजर भूमि का समुचित उपयोग मशरुम गृहों का निर्माण करके किया जा सकता है। इस प्रकार यह किसानों एवं बेरोजगार नवयुवकों के लिए एक सार्थक आय का माध्यम हो सकता है।
खेती का स्थान
साधारण हवादार कमरा, ग्रीन हाउस, गैरेज, बन्द बरामदा, पालीथिन के घर या छप्परों वाले कच्चे घरों में इसकी खेती की जाती है।
बीज (स्पॉन) अनाज के दानों पर बने उच्चगुणों वाले प्रमाणित बीज (स्पॉन) का ही व्यवहार करें । इसे बिरसा कृषि वि.वि. से प्राप्त कर सकते हैं।
प्रजातियाँ
अगेरिकस या बटन मशरुम – इसे कम्पोस्ट पर 18-250 से. तापक्रम पर जाड़े में उगाया जा सकता है।
वायस्टर या ढिगरी प्लूरोटस मशरुम – इसे 20-280 सें. तापक्रम पर सभीमोसम में उगाया जा सकता है।
वॉलवेरिया या धान के पुआल वाला मशरुम - 30-400 सें. तापक्रम पर गर्मी में उगाया जाता है।
कृत्रिम मशरुम घर में होने पर किसी भी मशरुम की खेती किसी भी समय हो सकती है। झारखण्ड के किसानों या उत्पादकों के लिए सामान्य कमरे के तापक्रम पर ढिगरी (प्लूरोटस) की खेती वर्ष के अधिकांश (9-10 माह) समय में हो सकती है।
ढिगरी (प्लूरोटस) की खेती की विधि
धान या गुंदली के पुआल के कुट्टी (1-1.5’’) या गेहूँ का भूसा 12 घण्टे तक पानी में भिगो लें या ½ घंटे तक उबाल लें। भिंगोने वाले पानी में ½ मिलीलीटर रोगर या नुवान या इंडोसल्फान और 1 ग्राम इंडोफिल या बैविस्टीन 75 मिली ग्राम प्रति लीटर की दर से डालें।
पानी निथार कर कुट्टी/ भूसे को छाये में सूखायें (50-60% नमी रहें)
पालीथिन के थैलियों में (45x60 सेंमी.) 5-6 छिद्र करें । आवश्यक मात्रा का बीज इस कुट्टी में मिला लें या तीन-चार तह लगाकर बिजाई करें । 30-50 ग्राम स्पॉन 1 किलो भीगे पुआल की कुट्टी के लिए पर्याप्त है।
थैलों के खुले मुख को रबर बैण्ड या धागें से बन्द कर लें । 10-15 दिनों के लिए इसे मशरुम उत्पादन घर में रखें।
कुट्टी सफेद हो जाने पर पालीथिन शीट को काटकर हटा लें तथा दिन में 1-2 बार पानी का छिड़काव करें।
2-3 दिनों में मशरुम के छत्ते निकल पड़ेंगे इसकी तुड़ाई पुआल से सटाकर हल्का सा घुमाव देकर करें । 3-4 फसल ली जा सकती है।
उपज
प्रति किलों ग्राम सूखे पुआल / भूसे से लगभग 0.8-1 किलोग्राम ताजा मशरुम का उत्पादन होगा। बटन मशरुम तथा धान पुआल की खेती की विधि के लिये बिरसा कृषि वि.वि के पौधा रोग विभाग से संपर्क करें।
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